Tuesday , 31 March 2020
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आखिर डायबिटीज़ पीड़ितों को कब मिल पाएगी अचूक दवा?

डायबिटीज़ आज केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में एक बड़ी समस्य़ा बनकर उभरा है और एक आकड़े के मुताबिक इसके पीड़ितों की संख्या करीब 422 मिलियन हैं और अकेले भारत में डायबिटीज़ के करीब 7 करोड़ पीड़ित है। एक्सपर्ट की मानें तो डायबिटीज़ जीवनभर साथ रहने वाली बीमारी है और इसे केवल परहेज के जरिए ही कंट्रोल में रखा जा सकता है।

कहने का अर्थ है कि अगर किसी व्यक्ति को एक बार डायबिटीज़ हो गया तो वह उसे केवल नियंत्रित करके ही जी सकता है। उस मर्ज को कभी खत्म नहीं कर सकता है। ऐसे में सवाल है कि क्या कभी डायबिटीज़ के पीड़ितों को ऐसी दवा मिल पाएगी, जिससे इस बीमारी को जड़ से खत्म किया जा सके?

इस लेख में हम इसी बात पर चर्चा करने जा रहे हैं कि आखिर डायबिटीज़ की अचूक दवा खोजने के सफर में वैज्ञानिक किस मोड़ तक पहुंच चुके हैं?

बायोटेक इंडस्ट्री कर रहा है जी-तोड़ मेहनत

मौजूदा दौर में डायबिटीज़ को जड़ से खत्म करने के दवाओं के बारे में बात करें तो अभी तक इसका कोई अचूक इलाज नहीं खोजा गया है। लेकिन आज भी बायोटेक इंडस्ट्री डायबिटीज़ के नए ट्रीटमेंट खोजने की जी-तोड़ कोशिशों में लगी हैं। वह सेल थेरेपी पर काम कर रही हैं और इसे बनाने की शुरुआती कोशिश में हैं। इसे बड़ी आशा के रूप में देखा जा रहा है।

एक्सपर्ट के मुताबिक यह सेल खासकर टाइप 1 डायबिटीज़ में मददगार रहेगा, जो नैचुरल इंसु‍लिन बनाने में मदद करेंगी। हालांकि शुरुआती स्टेज की कोशिश में पैन्क्रिएटिक कोशिकाओं का ट्रांस्प्लांटेशन सफल नहीं हुआ। इसके फेल होने की वजह इम्यून रिएक्शन माने गए। जो डोनर से सेल्स से मेल नहीं खाए। वहीं कम डोनर उपलब्ध होना भी इसके सीमित एक्पेरिमेंट की वजह रहा।

उधर यूनाइटेड स्टेट के डायबिटीज़ रिसर्च इंस्टिट्यूट में बायो-इंजिनियरिंग मिनि-ऑर्गन बनाया जा रहा है। जिसमें इन्सुलिन-प्रोड्यूसिंग सेल्स प्रोटेक्टिव बैरियर के साथ प्रावरण की जाएंगी। इसे लेकर संस्थान ने दो साल पहले घोषणा कर दी थी कि उन्होंने इस तरह से पहले मरीज़ का इलाज किया है, जिसका ट्रायल के पहले और दूसरे स्टेज तक ठीक रहा था।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

इसे लेकर डायबिटीज़ रिसर्च इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर कैमिलिओ रिकॉर्डी ने कहा था कि ये भी हमारे लिए बड़ी कमयाबी है। एक ऐसा ही एक छोटा डिवाइस यूनाइटेड किंगडम के जुवेनाइल डायबिटीज़ रिसर्च फाउंडेशन  ने वियसाइट (Viacyte) के साथ मिलकर बनाया था।

इस डिवाइस का पहला चरण कामयाब रहा था, जिसके बाद कंपनी इन्सुलिन-प्रोड्यूसिंग सेल्स के इन्ग्राफ्टमेंट को इंप्रूव करने पर काम कर रही है।

जर्मन एवोटेक के साथ काम कर रहे नोवो नॉर्डिस्क ने कहा था वे सेल्स थेरेपी डेवलप करने पर काम कर रहे हैं। वे स्टीम सेल्स और इनकैप्सूलेशन डिवाइस पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसका पहला क्लिनिकल ट्रायल अगले कुछ सालों में किया जाएगा।

बेल्जियम में भी है प्रयास है जारी

बेल्जियम की एक संस्था में भी ऐसी कोशिश की जा रही है, जिसमें मरीज के लीवर से सेल्स बनाई जा सकती हैं। जिनको इस तरह प्रोग्राम किया जाए कि वो इन्सुलिन तैयार करने वाली सेल्स की तरह काम करें। इससे डोनर और रिसीवर वाली प्रक्रिया आसान हो जाएगा।

यूके के एज़लेक्ज़ा में भी इस तरह की प्रक्रिया पर काम हो रहा है। वहां लीवर की जगह पैंक्रियाज से सेल्स डेवलप करने पर काम हो रहा है।

बता दें कि टाइप 1 डायबिटीज़ के मरीज अब तक पूरी तरह सिर्फ इन्सुलिन इंजेक्शन पर निर्भर हैं। एक फ्रेंच कंपनी भी टाइप 1 डायबिटीज़ को ठीक करने के लिए इम्यूनोथेरेपी (immunotherapy) के ट्रायल्स पर काम कर रही है।

हालांकि डायबिटीज़ की अचूक दवा कब आएगी? यह तो भविष्य में ही तय होगा लेकिन अभी जो मरीज हैं उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने ब्लड ग्लूकोज लेवल को कंट्रोल में रखना है।

ऐसे में हम उन्हें यही सलाह देंगे कि वे अपनी लाइफस्टाइल को स्वस्थ्य रखें और नियमित ब्लड शुगर लेवल को चेक करने के लिए बीटओ स्मार्टफोन ग्लूकोमीटर का इस्तेमाल करें। वे अपने खान-पान को दुरूस्त रखें और समय-समय पर अपने चिकित्सक की सलाह लेते रहें।

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